woensdag, maart 21, 2007

Now

Do not dwell in the past, do not dream of the future,
concentrate the mind on the present moment.

-- Siddharta Gautama--

9 opmerkingen:

dining_philosopher zei
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-Papa zei

The ego lives either in the past or in an imagined future. It cannot exist in the present.

scruffysmileyface zei

But staying in the present is the only way to experience reality.

Oceanshaman zei

Thank you for this reminder . . . and for your blog . . .

I'm hooked . . . you're linked . . .

Namaste . . .

susan zei

I've meant to come visit since seeing your comments on Gary's and I'm happy I did. After meditating for years I've come to the conclusion that a 7 year old novice monk knows more about Buddhism than I can hope to learn in what planet-bound time I have left. Nevertheless, I shall continue and night is best for me when the place is dark but I can see the shapes of the lama trees against the sky.
Arya Tara - Karmapa Khennayo

EarthCitizen #23 'Scott' zei

I am Returning to the NOW,
and was thinking of you my friend
hope all is well
Scott

hugh s zei

hi, i like your blog, its very spiritual and i love reading your random quirky jokes.

Martin 82 zei

Good. I heard an version of this saying of the Buddha on Youtube on a monks talk - it was something like - "The past is gone and the future is not here yet, so dwell with the present (five kundalas?)."
It is a great anchor to keep you "here."

Namaskar Meditation zei

Dhyan Mudra
यह मुद्रा ध्यान की बनी हुई स्थिति को और स्थायित्व प्रदान करने के लिए है |
जब ध्यान में उर्जा का संचार होने लगता है |
तो उस संचार में किसी प्रकार की कोई बाधा न आये और वह संचार लगातार होता रहे उसके लिए यह मुद्रा होती है |
जिससे ध्यान करने वाला और अधिक देर तक बैठा रहता है ध्यान में |
और इस मुद्रा में बैठने के कारण उर्जा को पूरे शारीर में संचारित होने में सहायता मिलती है |
जिससे ध्यान करनेवाला अपने आपको बहुत हल्का और उर्जा से भरपूर पाता है |
इस मुद्रा में बैठने के कारण धीरे-धीरे उसको शरीर का भारीपन समाप्त हो जाता है |
और वह बिना किसी दर्द के काफी देर तक ध्यान में बैठ सकता है |
जब भी कोई ध्यान में बैठता है तो उसे पहले घुटनों में दर्द होता है |
और उसे लगता है की वह तो यूँ ही फालतू बैठा है |
किन्तु यह मुद्रा उसका दर्द और उसकी बोरियत समाप्त कर देती है |
अतः जिसको भी ध्यान में अधिक समय तक बैठना है उसके लिए यह मुद्रा है |
वैसे और भी मुद्राएं है ध्यान में बैठने के लिए किन्तु इस मुद्रा को अमिट आभा नाम से जाना जाता है |
और यह मुद्रा बोद्ध धर्म के वज्रयान में इसी नाम से जानी जाती है |
आमिट आभा यानी मिट न सके ऐसी आभा |
और ध्यान में आभा के लिए ही बैठा जाता है |
की जो भोजन हमने किया है उस भोजन को कैसे ओज में आभा में बदला जाए यह काम ध्यन में किया जाता है |
नहीं तो वह उर्जा शरीर से बहार किसी भी रूप में जा सकती है |
अतः उस उर्जा को आभा जो मिट न सके ऐसी आभा में परिवर्तित करने के लिए यह ध्यन मुद्रा है |
इसी अमिट आभा पर ही इस समय के अभिनेता - अमिताभ का नाम पड़ा है |
यह किस्सा ऐसा है हरिवंश राय बच्चन के मित्र थे सुमित्रानंदन पन्त |
सुमित्रानंदन पन्त के पास जब अमिताभ को लाया गया तो उन्होंने अमिताभ के चेहरे की आभा को देखकर कहा था की इसका नाम तो अमिताभ होना चाहिए क्यूँकी इसके पास जो आभा है वह कभी ख़तम नहीं होगी | इसी से अमिताभ का नाम अमिताभ पड़ा |
यह मुद्रा बड़े-बड़े ध्यानियों ने ध्यान करने के लिए उपयोग में ली है |